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गोबर

गोबर
25 Dec 2018 No Comments Story Niraj Pathak

हमारे मोहल्ले के नवनिर्वाचित वार्ड पार्षद रोज सुबह अपने घर से निकलते और पाते की सड़क पर पूरी सफाई दिख रही है, कुछ इक्का दुक्का प्लास्टिक के रैपर या कागज के टुकड़ों के अतिरिक्त उन्हें कुछ खास गन्दगी नजर नहीं आती थी. वे मन ही मन बहुत प्रसन्न हुआ करते और अपने सफाई कर्मियों की तारीफ भी मौके बेमौके अपनी जनता के बीच कर दिया करते.

पार्षद बनते ही उन्होंने अपने में कुछ बदलाव भी लाया और जो पहले कभी यदा कदा कहीं गलती से कुछ फेंक दिया करते थे, अब ऐसा करना बिलकुल बंद कर दिया था. वे सदैव ही अपने परिवार के सदस्यों से आग्रह कर दिया करते कि अब उनको अथवा उनके परिवार के किसी सदस्य द्वारा ऐसा किया जाना कतई जायज नहीं, आखिर उन्हें एक आदर्श जो स्थापित करना था.

वे हमेशा चिंतन मनन करते रहते कि कैसे लोगों में स्वच्छता को लेकर जागरूकता फैलाई जाये, और तो और तब उनका मन और दुखी हो जाता जब वे चाय की दुकान पर बैठे भैया जी, जो एक मात्र उनकी बातों के बहुत ही ध्यान से सुनते और सहमत होते थे, चाय पीने के बाद प्लास्टिक के कप को बड़ी बेध्यानी से रोड पर ही फेंक देते और पार्षद जी भी झेंपते हुए दुकानदार को सलाह देने लगते कि भाई प्लास्टिक का कप क्यों रखते हो? तब दुकानदार अपनी आर्थिक स्थिति का आंकलन करके बताता कि सर ये सस्ता पड़ता हैं ना, आज कल मिट्टी के भांड से भी सस्ता ये प्लास्टिक के कप हैं, कागज वाला मिट्टी वाले से थोड़ा ही सस्ता है मगर प्लास्टिक का कोई मुकाबला नहीं. फिर हमारे पार्षद जी मन मसोस कर रह जाते.

कई मौकों पर जब उन्हें बुलाया जाता किसी उद्घाटन या संबोधन आदि के लिए तो वे वहां भी स्वच्छता और प्लास्टिक आदि के विरोध में भाषण झाड़ बैठते और आयोजकों से कहते कि अगली बार वे जब उन्हें बुलाएँ तो वे वचन दें कि प्लास्टिक के कप या ग्लास का प्रयोग नहीं करेंगे. फिर क्या आज तक वे दुबारा किसी संबोधन के लिए एक जगह पर नहीं जा पाए.

वास्तव में पार्षद जी हमेशा मन कि स्वच्छता को लेकर चिंतित रहने लगे थे. क्योंकि असली गन्दगी तो हमारे मन में भरी थी. लोगों की स्वच्छता सम्बन्धी शिकायतों का अम्बार रोज उन्हें सफाई कर्मियों को निर्देश देकर निपटाना पड़ रहा था. वे अपनी पूरी कोशिश में लगे थे.

एक दिन उन्हें उनकी श्रीमती जी ने बताया कि पड़ोस के सेवा निवृत शिक्षक महोदय रोज सुबह अपने घर के सामने की गली में स्वयं ही झाड़ू लगा लिया करते हैं, फिर क्या था पार्षद जी जा पहुंचे मास्टर साहब के घर और हाथ जोड़ कर निवेदन किया कि वे ऐसा न किया करें सफाई कर्मी कर दिया करेंगे. मास्टर जी ने कहा कि उन्हें ऐसा करना न सिर्फ अच्छा लगता है बल्कि ये उन्हें जरूर करना चाहिए क्योंकि स्वच्छता सिर्फ पार्षद की जिम्मेदारी नहीं हम नागरिकों की भी जिम्मेदारी है और बिना जन सहयोग के इसे प्राप्त नही किया जा सकता. फिर भी बड़े आग्रह के बाद आज के दिन उन्होंने पार्षद जी का आग्रह मान लिय था और पार्षद जी ने सफाई कर्मी को मोबाइल फोन से आदेश दे डाला कि आज इस गली को साफ कर दिया जाय.

पार्षद जी की बात अभी पूरी भी नहीं होने पाई थी कि एक खुली गाय ने आकर गोबर कर दिया वही मास्टर जी के घर के सामने ही. चूंकि पार्षद जी ने सफाईकर्मी को आदेश दे दिया था तो वे मास्टर जी को आश्वस्त करते हुए आगे बढ़ गए और लगभग मोहल्ले से कुछ ही दूर गए होंगे कि घर से श्रीमती जी का फोन आया कि आज बस नहीं आयेगी और उन्हें बच्चों को स्कूल छोड़ने जाना होगा, फिर क्या पार्षद जी उलटे पांव घर की और लौट चले.

जैसे ही वे मास्टर जी के घर के सामने से गुजरे तो उन्होंने देखा कि जो गोबर थोड़ी देर पहले उनके दरवाजे पर था उससे पानी के साथ मिश्रित करके सामने के हिस्से को लीपा जा चूका था और मास्टर जी हाथ में झाड़ू लिए घर के अन्दर प्रविष्ट हो रहे थे. समस्या का समाधान उसी में ढूँढा जा चूका था.

पार्षद जी सोचते सोचते घर की और बढ रहे थे कि काश ऐसे लोग आज हमारे समाज में हों कि जो हमारे आस पास को अपना घर समझें और जैसे अपने घर के अन्दर सफाई रखते हैं वैसे ही घर के बाहर भी स्वच्छता में अपना सहयोग दें न कि अपना कचरा दूसरे के घर के बाहर डाल दें और कोई और डाले तो उसे रोकें और उसकी शिकायत करें. सचमुच मास्टर जी जैसे विचार वालों की बहुत आवश्यकता है.

आखिर यह कैसी विडंबना है कि हम आत्मशुद्धि के नाम पर शरीर चमकाते हैं और स्वच्छता के नाम पर अपना घर जबकि मन अन्दर से और घर बाहर से मैला ही रह जाता है. पार्षद जी ने मन ही मन ठान लिया कि वे आने वाले गणतंत्र दिवस पर मास्टर जी को सम्मानित करेंगे स्वच्छता में अपना योगदान देने के लिए.

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Niraj Pathak IT-Professional, Motivational Speaker, Writer, Ward-Councillor at Municipal Council of Phusro.
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