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दुनिया में आये हैं, कुछ कर जाना है…

दुनिया में आये हैं, कुछ कर जाना है…
16 Oct 2020 No Comments Poem Niraj Pathak

दुनिया में आए हैं, कुछ कर जाना है।

काम करें हम ऐसे, कल मर जाना है।।

रोज यहां जीने को, व्यापार चलाना है [01]

 

सीखने को हरदम, तैयार तुम रहना।

ना कुछ कर पाए तो, अफसोस नहीं करना।।

कम से कम अपना, किरदार निभाना है [02]

 

वे तो हैं खबरी, ले लेंगे खबर सबकी।

कुछ मेरी, कुछ तेरी, खबरें छप जाएगी।।

मजबूरी है उनकी, अख़बार चलाना है [03]

 

कर्जा देने को, तैयार खड़े हैं वो।

और वसूली को, फिर फोन घुमाते वो।।

उनको भी तो अपना, कारोबार चलाना है [04]

 

ना फंस जाए नैया, अपनी मझधारों में।

मिलजुल कर मोड़ेंगे, नदिया की धारों को।।

सब की नैया को, अब पार लगाना है [05]

 

कोई बंदा किस्मत को, जब कोसता होगा।

क्यों बना डाले इंसा, रब सोचता होगा।।

क्या करेगा उसको भी, संसार चलाना है [06]

 

क्यों आए यहां पर तुम, कभी सोचा है तुमने।

क्यों मिला है ये जीवन, क्या करना है इसमें।।

चेहरे पे हंसी रखनी है, औरों को हंसाना है [07]

 

मिल जाती है कुरसी, जब बन जाता गठबंधन।

कोशिश तगड़ी ना हो तब बन जाता ठगबंधन।।

अरे, जैसे तैसे इनको, सरकार चलाना है [08]

 

सभी जीवित प्राणी में, है अपनी बुद्धि उत्तम।

अहं की अग्नि में, क्यों झुलस रहा ये जीवन।।

जंग लगी बुद्धि को, अब धार लगाना है [09]

 

अगलबगल में बिखरे हैं, कितने ही जड़चेतन।

निर्भर करता सब हमपर, हम कितने हुए सचेतन।।

अब अपने बच्चों को, संस्कार सिखाना है. [10]

 

तुम चाहो सब जुट जाएँ, लगा के अपना तनमन।

काम करें सब पूरे मन से, पाए आधा वेतन।।

क्या करेंगे उनको भी, परिवार चलाना है[11]

 

सूखी धरती, बीज भुना, वो करेंगे कैसे खेती।

जूं रेंगे ना जब कानों पर, किसे सुनाएँ बीती।।

कुछ करके उनको भी, अधिकार दिलाना है [12]

 

हक़ मारे जो जनता का, पाए वही सिंहासन।

सर में ठंढा तेल लगाकर, सोया रहे प्रशासन।।

मनमंदिर का अब तो, जीर्णोद्धार कराना है [13]

 

बेअक्लों के बकने से, कोई आसन कब डोला है

साध के चुप्पी मौन रहे, मुख अपना कब खोला है ।।

गूंगों के मुखे से अब तो, हुंकार कराना है [14]

 

बंदूके तन जाती है, कुछ फायर भी जाते है।

कुछ तो पत्थर फेंक कर, कायर भी कह जाते है ।।

दुश्मन की वादी में अपना, जयकार कराना है [15]

 

उनकी मुट्ठी लाख की, क्यों अपनी मुट्ठी ख़ाक की।

धेले भर औकात नहीं, क्यों बातें अपनी साख की ।।

अपनी गलती का खुद को, अहसास कराना है [16]

 

मुट्ठी भर गेहूँ पर हम भी, रह सकते थे जिन्दा।

पर लालच के कारण धन की, करते थे नित चिंता।।

सदियों के इस भूल को, स्वीकार कराना है [17]

 

हर बेटे की सरेआम नीलामी, होती है बाजारों में

हर बेटी के बाप की गिनती, होती है लाचारों में।।

पुरखों के इस रोग का, उपचार कराना है [18]

 

निर्भयता का ढोंग रचा के, हम कहाँ पहुँचने वाले है.

सरेआम जो लूटें इज्जत, कब शूली चढ़ने वाले है.

इन दुष्टों का अब तो, संहार कराना है [19]

 

कोई पूछे या ना पूछे, कोई आये या ना आये।

इस कश्ती को बिन मांझी, ये धार जिधर ले जाये।।

अपने ही हाथों से अब तो, बेडा पार लगाना है [20]

भूले नहीं भुला सकते, जो होते पुरातन ।
अमिट मित्रता होती उनकी, जो होते सनातन।।
भूले बिसरों को अब ये, व्यवहार सीखना है[21]

 

 

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Niraj Pathak IT-Professional, Motivational Speaker, Writer, Ward-Councillor at Municipal Council of Phusro.
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