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सामाजिक उपादेयता और आप – “समृद्ध झारखंड” में प्रकाशित आलेख 02

सामाजिक उपादेयता और आप – “समृद्ध झारखंड” में प्रकाशित आलेख 02
16 Sep 2019 No Comments Article Niraj Pathak

रांची, झारखंड से प्रकाशित होने वाली विख्यात पत्रिका “समृद्ध झारखंड” में प्रकाशित मेरे कुछ आलेख। पूरी टीम को बधाई ।

सामाजिक उपादेयता और आप

हमें आज हर तरफ बहुत कुछ होता दिखाई पड़ जाता है, गाहे-बगाहे सुनाई भी पड़ जाता है. और तो और हम सोशल मीडिया के अनुप्रयोग के माध्यम से भी प्रतिपल अद्यतित होते रहते हैं. हमारा अधिकांश समय उनकी सूचनाओं को छाटने में भी निकलता रहता है. कुछ लोग इसे व्यर्थ का समय गवाना कहते हैं, जबकि कुछ लोगों के लिए यह खाली समय में मनोरंजन का साधन मात्र है, पर कुछ इसे गंभीरता पूर्वक प्रयोग में लाते हैं. यह व्यक्ति के अपने-अपने कार्य शैली पर निर्भर है, कि इन माध्यमों का वह अपने लिए कैसे सदुपयोग करता है, या यों कहें कि कर पाता है.

इन सब बातों से एक बात निकलकर सामने आती है, वह यह है, कि आप आज के व्यस्ततम परिवेश में जब एक ओर अपने परिवार के लिए समय नहीं निकाल पाते हैं, तो आपसे समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व के निर्वहन की अपेक्षा कैसे की जाए? आज हम यंत्रवत अपने सभी कार्य को बस पूरा करने की ओर लगे रहते हैं. किसी भी कार्य को समय पर पूरा करना एक अपेक्षित उत्तरदायित्व है, साथ ही उस कार्य निष्पादन के साथ उससे जुड़ी सामाजिक उपादेयता भी जरुरी है. जिस प्रकार मात्र भोजन बनने से लेकर उसके खाए जाने तक ही बात सिमित नहीं होती वरन उसका स्वादिष्ट एवं सुपाच्य होना भी आवश्यक होता है, उसी प्रकार आपकी दैनिक गतिविधि आपकी सामाजिक उपादेयता स्वत: सिद्ध कर जाती है.

सामाजिक उपादेयता को प्राप्त करना पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि आपका समाज के लिए योगदान क्या है? आप किसी भी पेशे से हो सकते हैं, उसपर आपका पूरा नियन्त्रण हो सकता है, आप अपने निर्दिष्ट कार्य के लिए उपयुक्त हो सकते है परन्तु यह सभी बातें आपके उत्तारदायित्व से सम्बंधित हैं. आपकी उपादेयता से नहीं. हमारा समाज अपने प्रारब्ध से ही “सर्वोत्तम की उपादेयता” पर आधारित है, यह उपादेयता उसके सामाजिक योगदान के स्वरुप पर निर्भर रही है. अर्थात योगदान जितना व्यापक होता है उसकी उपादेयता उतनी ही दीर्घकालिक होती है. आज टैगोर, विनोबा, गाँधी, नेहरु, शास्त्री, अम्बेडकर आदि ऐतिहासिक पुरोधाओं के नाम का स्मरण होते ही उनकी उपदेयता स्वतः स्पष्ट हो जाती है, कि उनके अभूतपूर्व व अमूल्य योगदान ने उनको समाज में सदा के लिए अमर बना दिया है. ऐसे ही हम किसी भी व्यवसाय अथवा उद्यम से जुड़े हों हमें अपना सर्वोत्तम प्रदान करना होता है, अपने पेशे से पूरी ईमानदारी बरतनी होती है. जब हम ऐसा करते हैं तो हमारे ही गुणों में निखार आता है. यदि हम वकील हैं, फीस के अनुसार किसी केश को कमजोर या मजबूत करेंगे तो अंततः बदनामी हमारी ही होगी यदि हम केश हार जाते हैं. यदि हम शिक्षक हैं, पैसे के कारण शिक्षा प्रदान करने में कमी लायेंगे तो बच्चे के फेल होने पर हमारी ही कमी आंकी जाएगी. यदि हम डॉक्टर हैं, पैसे के कारण मरीज के इलाज में कोताही बरतेंगे तो हमारे ही मरीज घटेंगे.

अर्थात यदि हम अपना सर्वोत्तम नहीं देते तो हमारी उपादेयता कम होती है और समाज में स्थान प्राप्त नहीं हो पाता. हम एक सामाजिक प्राणी हैं, समाज के बेहतरी में हमारा किंचित भी योगदान है तो वह उल्लेखनीय होना ही चाहिए. हम अपनी उपादेयता के बल पर अपने योगदान के स्वरुप को वृहत से वृहत्तर बना सकते हैं. सभी चीजों का एक गुणधर्म होता है. यदि यह सापेक्ष है तो गलत है. इसे हमेशा निरपेक्ष होना ही चाहिए. उदाहरण के तौर पर आग जलाती है पर यदि आग जलाने का काम बंद कर दे तो, पानी प्यास बुझाता है यदि न बुझाये तो, आदि. ठीक वैसे ही हमें किसी के व्यवहार से प्रभावित होकर अपने सिद्धांतो में परिवर्तन नहीं करना चाहिए, कुसंगति में पड़कर भी अपनी संगती नहीं त्यागनी चाहिए, हमें सामने वाले को अपनी नक़ल के लिए विवश कर देना चाहिए न कि हम सामने वाले की नक़ल करने लग जाएँ. हमें अपनी शख्सियत को उस स्तर तक ले जाना चाहिए कि एक उदाहरण बन जाए.

इसके लिए एक काम जरुरी हो जाता है जिसे आप कोई भी हों, आप समाज के किसी भी तबके से सम्बन्ध रखते हों, किसी भी पेशे में हों, यहाँ तक कि आपकी की आर्थिक स्थिति जैसी भी हो, कर सकते हैं. यदि आप विद्यार्थी हैं तो अपने से कम उम्र वालों को पढ़ायें. यदि आप शिक्षक हैं तो विद्यार्थियों को इतना दें कि उसे अन्य कहीं अतिरिक्त अध्ययन के लिए न जाना पड़े, और चलिए यदि आप ट्यूशन अथवा कोचिंग से जुड़े शिक्षक हैं तो 100 में से 10 जरुरतमंदों को तो आप साथ लेकर चल ही सकते हैं. यदि आप वकील हैं तो कम से कम महीने में एक दिन अवश्य ही जरुरतमंदों को निःशुल्क सेवाएँ दें. आप व्यापारी हैं तो अपनी वस्तुओं और सेवाओं की गुणवत्ता को उस स्तर तक ले जाएँ कि आपकी सानी बढे.

यह सभी चीजें बिलकुल ही नयी नहीं. पर इसकी प्रयुक्तता की सामाजिक कमी ने मुझ जैसों को प्रेरित किया है कि कुछ ऐसी बात हो, जो सबके लिए अनुकरणीय हो सके. वर्तमान सामाजिक परिवेश में सबसे ज्यादा इसी बात की कमी पाई जाती है कि हम बातें कर तो लेते हैं, चीजों को पढ़ व समझ भी लेते हैं, पर उसकी अनुकरणीयता से परे रह जाते हैं. इसलिए हमें आपसे यह अपेक्षा है कि आप जो भी हों, जिस किसी भी पेशे से सम्बन्ध रखते हों, अपने मन, वचन और कर्म से अपनी जिम्मेदारियों को जिम्मेदारी के साथ पूरा करें और राष्ट्र के निर्माण में भागीदार बन अपनी उपादेयता को सिद्ध करें ताकि आपके इस योगदान के लिए समाज आपको सदा याद रखे.

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Niraj Pathak IT-Professional, Motivational Speaker, Writer, Ward-Councillor at Municipal Council of Phusro.
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