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क्या मैं सात्विक हूँ? – “समृद्ध झारखंड” में प्रकाशित आलेख 05

क्या मैं सात्विक हूँ? – “समृद्ध झारखंड” में प्रकाशित आलेख 05
16 Sep 2019 No Comments Article Niraj Pathak

रांची, झारखंड से प्रकाशित होने वाली विख्यात पत्रिका “समृद्ध झारखंड” में प्रकाशित मेरे कुछ आलेख। पूरी टीम को बधाई ।

क्या मैं सात्विक हूँ?

बिना किसी भेदभाव, लाग लपेट, पूर्वाग्रह से ग्रसित अथवा संकुचित ह्रदय से जब व्यक्ति दैनिक जीवन में आचरण करता है अथवा अपने क्रिया कलापों को पूर्ण करता है, तो इसका श्रेय उसकी सात्विकता को जाता है, इसका कोई निश्चित मापदंड नहीं होता अपितु सभी मापदंडों में यह संतुलित प्रकार का होता है. सात्विकता का होना इस बात पर पूरी तरह से निर्भर भले ही न करता हो कि वह व्यक्ति अपने जीवन में क्या है और किस कर्म से जुड़ा है यद्यपि उसकी जीवन शैली एवं उसके व्यवहार से यह अवश्य ही परिलक्षित हो जाता है.

गुण तीन प्रकार के कहे गए हैं, रजोगुण, तमोगुण एवं सतोगुण. रजोगुण से प्रभावित व्यक्ति कर्म की प्रधानता से भरा होकर उसको पूरा किये जाने के लिए, समुचित, अनुशाषित एवं व्यवस्थित प्रकार से, अपनी पूरी क्षमता के साथ लगा होता है, वहीं तमोगुण से प्रभावित व्यक्ति चाहे जैसे भी हो कर्म को प्रधानता देते हुए उसे पूरा करने के लिए उद्दात रहता है और सभी प्रकार के प्रपंचों का सहारा भी ले लेता है, जबकि सतोगुण से प्रभावित व्यक्ति अपनी निष्ठा एवं अपने नैतिक मूल्यों के आधार पर किसी कर्म को पूरा करने की अपेक्षा रखता है, भले ही वह कर्म पूरा हो पावे अथवा नहीं पर वह अपने मूल्यों से कभी डिगता नहीं, ऐसे व्यक्ति सदैव सत्य के साक्षात्कार को तत्पर रहते हैं.

व्यक्ति जिस परिवेश में निवास करता है, जैसे लोगों के बीच रहता है, जैसा व्यवसाय करता है अथवा जैसा भोजन कर पाता है आदि, इन सब बातों का उसके जीवन पर, उसके आचरण पर, अथवा उसकी वाणी आदि पर समानुपाती प्रभाव पड़ता ही है. बहुत कम ऐसे देखे जाते हैं अथवा देखे गए हैं जो इन सबसे अप्रभावित रहे हों. वस्तुतः परिवेश एक उत्प्रेरक की भांति आपके गुणों के परिष्करण में अपनी सहभागिता निभाता है. आप इससे अनभिज्ञ भी हो सकते हैं और अपने दैनिक क्रियाकलापों में व्यस्त भी, और इससे विशेष कुछ घटता बढ़ता नहीं बस आपकी सात्विकता प्रभावित हो जाती है, और आप किसी एक गुण से ग्रसित हो जाते हैं. इस संक्रमण के प्रारंभिक चरण में इसका प्रभाव व्यक्ति के मन पर पड़ता है और वह हर क्रिया के विपरीत एवं समानुपाती प्रतिक्रिया के लिए तत्पर हो जाता है. तत्पश्चात वह इसे अपनी वाणी में सम्मिलित कर लेता है और अंततः उसके कर्म में परिलक्षित होने लग जाता है.

अब बात करते हैं इस आलेख के शीर्षक के सार्थकता की, क्या मैं सात्विक हूँ? जैसा की पहले भी इस आलेख में कहा गया कि इसका कोई निश्चित मापदंड नहीं अपितु यदि हम अपने मूल्यों की समीक्षा स्वयं कर पायें तो इसके मापदंड को एक निश्चित आकार जरुर दिया जा सकता है. इसका प्रारब्ध मन से होता है, मन में विचार, दृश्य अथवा श्रवण से व्युत्पन्न होते हैं, यद्यपि मन पर नियंत्रण हो, तो दृश्य अथवा श्रवण का विशेष प्रभाव नहीं पड़ पाता. इसे एक उदाहरण से समझने का प्रयत्न करते हैं. मैं ऐसा मान लूं कि मैं अपनी ओर से अपने मन, वचन और कर्म से किसी भी जीवधारी को कष्ट नहीं पहुंचाउंगा, फिर मैंने कुछ देखा अथवा सुना और विचार मन में प्रविष्ट होते ही द्वंद्व आरंभ हुआ, फिर मैं एक निर्णय पर पहुंचा, और यही निर्णय मेरे ही मापदंडों के मुताबिक जितना मेल खाता हुआ होगा मैं उतना ही सात्विक हूँगा. यहाँ जितना और उतना से हमारा तात्पर्य सात्विकता को सीधे तौर पर मापना नहीं है, क्योंकि सात्विकता तो पूर्ण अंक की तरह है दशमलव भी इधर उधर हुई तो फिर वह, वह नहीं होगी.

सात्विकता, मन से शुरू होती है और मन ही पर आकर समाप्त भी. जिस प्रकार मन में अलग अलग दृश्यों को देखकर अलग अलग भावनाएं जन्म लेती हैं, उन्हीं भावनाओं से हमारे विचार बनते हैं और कर्म भी प्रभावित हो जाता है उन प्रभावित विचारों से, उसी प्रकार भोजन, परिवेश, आचरण, शिक्षा, संस्कार इत्यादि भी कई कारक तत्व हैं जिनसे हमारा मन प्रभावित होता ही रहता है. अर्थात हमारे मन पर चहुँओर से आघात होता ही रहता है और जिससे हम कभी कभी विचलित भी हो जाते हैं.

अब आवश्यकता है इस विचलन को रोकने की, तो इसमें आप सिद्धहस्त हैं ये मुझे पता है तभी आप इस पैराग्राफ को पढ़ रहे हैं अभी. फिर भी अपनी अनुभूति हेतु आलेख पूर्ण करने के लिए लिखता हूँ कि कुछ ऐसा करें जिससे कि आपका नियंत्रण अपने ही मन पर बढ़े जैसे यदि आप किसी बात अथवा चीज के आदि हैं तो उससे दूर बिल्कुल भी न भागें, उसका सामना करें और फिर उसे नकारें, धीरे धीरे आपकी आदत बदल जायगी, और आपका स्वयं पर नियंत्रण भी बढ़ जायेगा क्योंकि नियंत्रण ही सबसे जरुरी कारक तत्व है सात्विकता को बनाये रखने को. कहने को सभी सात्विक होते हैं पर यह जरुरी नहीं कि मांस भक्षण करने वाला दयालु नहीं हो सकता अथवा शाकाहारी व्यक्ति कभी हिंसक नहीं हो सकता, पर संभावनाएं कुछ भी करा सकती हैं तो ऐसे में किस बात की आवश्यकता है? क्या नियंत्रण की? नहीं – संतुलन की आवश्यकता है और वह भी पूरी नहीं हो सकती क्योंकि फिर कुछ बचेगा नहीं. यदि जरुरी है तो संतुलन बनाये रखने के प्रयास की, क्योंकि प्रयास से ही संतुलन, नियंत्रण आदि संभव है फिर सात्विकता तो अपने आप ही अपना स्थान सुनिश्चित कर लेगी.

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About The Author
Niraj Pathak IT-Professional, Motivational Speaker, Writer, Ward-Councillor at Municipal Council of Phusro.
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