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नीति के तीन उपसर्ग राज, कूट व सेवा – “समृद्ध झारखंड” में प्रकाशित आलेख 01

नीति के तीन उपसर्ग राज, कूट व सेवा – “समृद्ध झारखंड” में प्रकाशित आलेख 01
16 Sep 2019 No Comments Article Niraj Pathak

रांची, झारखंड से प्रकाशित होने वाली विख्यात पत्रिका “समृद्ध झारखंड” में प्रकाशित मेरे कुछ आलेख। पूरी टीम को बधाई ।

नीति के तीन उपसर्ग राज, कूट व सेवा

जब आप सामान्य रूप से किसी भी नीति के बारे में अध्ययन कर रहे होते हैं अथवा किसी ज्ञानवान से इसका ज्ञान प्राप्त कर रहे होते हैं तब आप किसी विषय गत एवं संदर्भित क्रियाकलापों के नियामक के रूप में उक्त नीति को निकटता से समझने का प्रयास कर रहे होते हैं. नीति व इसके निर्धारक तत्वों के बारे में जानने से अधिक आवश्यक इस बात का भी अध्ययन होना चाहिए कि उक्त नीति के मूल में क्या छिपा है.

राजनीती जहाँ एक ओर राज-काज चलाने से सीधे रूप से सम्बंधित है वहीं कूटनीति उन समस्त तंत्रात्मक गतिविधियों का जाल होता है जिससे राजनीति प्रभावित हो जाती है और उलझ कर रह जाती है. राजनीति अर्थात राज-काज चलाने हेतु नीतियों के निर्धारण में यदि सेवा भाव का समावेश हो और वह सेवानीति के रूप में सामने आये तो इसकी छवि मानस पटल पर अमिट हो जाती है.

इस आलेख में हम नीति के तीन उपसर्गों की चर्चा करेंगे, जहाँ एक ओर नीति अपने स्वतन्त्र रूप में किसी नियम के अनुकरण के स्वरुप पर निर्भर होती है वहीं दूसरी ओर इनके उपसर्ग इसको एक विशिष्ट पहचान दे जाते हैं. यह विशिष पहचान ही इसके मूल को तय करते हैं.

अब प्रश्न यह है कि ऐसे कौन से नियामक तत्व हैं जो नीति को तटस्थ रख उनके उपसर्गों की सार्थकता को सिद्ध कर पाते हैं. उपसर्गों से सामंजस्य स्थापित होना नीति को प्रभावित नहीं करता वरन उसके मूल तत्व को प्रभावित करता है.

राजनीती को सदा से ही अन्य दृष्टि से देखा गया है, जिसमें अपने पराये सत्ता के सुख के आगे कोई महत्व नहीं रखते और इसकी पराकाष्ठा को हमने अपने इतिहास को कई बार दोहराते हुए देखा भी है. कहा भी गया है जब एक अहित से बहुतों का हित जुड़ा हो तो ऐसे अहित से स्वयं को जोड़े जाने पर अथवा कलंकित होने पर भी आप बहुतों के ह्रदय में अपना स्थान तो पा ही लेते हैं, कहते हैं न कि बदनाम हुए तो क्या हुआ, कुछ नाम तो होगा.

उपयोग और उद्देश्य किसी नीति को उसके उपसर्गों में सामंजस्य स्थापित होने देने के लिए अतिअवाश्यक हैं. जिस प्रकार षडयंत्र में कुल छः यंत्र होतें हैं जो सदैब ही अनैतिक उपायों के समूह हैं और इनका प्रयोग हमेशा से ही अमर्यादित रहा है. अर्थात जहाँ एक ओर हम किसी के नैसर्गिक गुणों को भली प्रकार जानते हैं फिर भी हम अपने स्तर से उसके नैतिक प्रयोग पर बल नहीं दे पाते हैं, अब चाकू से सब्जी काटें किसी का गला नहीं, आग से किसी का घर न जलाएं बल्कि दीप जलाएं.

नैतिक एवं सार्थक उद्देश्य हेतु ही श्री कृष्ण ने एवं विष्णुगुप्त (कौटिल्य) ने भी कूटनीति का सहारा लिया था पर यह कि हम भी वैसा ही करें इस बात की दुहाई देकर कि जब उन्होंने ऐसा किया तो हम क्यों नहीं. हम उनकी लीलाओं से सबक जरुर सीख सकते हैं पर यह कि हम भी उनके कृत्यों को अनुकरण में शामिल करें तो उससे पहले एक बात जरुर समझ लेनी चाहिए कि हमें सर्वप्रथम उनके जैसा बनना भी चाहिए. हम बड़ी आसानी से किसी के अवगुणों को पहचान लेते हैं और उसकी आलोचना तक कर बैठते हैं बिना यह सोचे कि हम उस कसौटी पर अगर खड़े होते तो क्या कर रहे होते.

अवसर आपको मार्ग चुनने के लिए आकर्षित अवश्य करता है पर सही विकल्प चुनना आपका अधिकार है साथ ही उस विकल्प से कितनों का हित अहित जुड़ा है यह भी ध्यातव्य होना ही चाहिए, न कि आप किसी स्वार्थ, लोभ, मात्र स्वहित साधन अथवा ऐसे ही संकीर्ण मानसिकता के वशीभूत हो अपने निर्णय को प्रभावित कर बैठे और फिर कोई भी आपके सामने आपका ही प्रतिनिधि बन जाये जिसे दूर दूर तक समाज के हित से कोई मतलब न हो.

सभी प्रकार की नीतियों में सेवा भाव का होना अत्यंत आवश्यक है. क्योंकि यही वह भाव है जो आपके कर्म और विचार को सार्थकता प्रदान करता है. आप कोई भी कर्म करें जब तक सेवा भाव का अभाव रहेगा, कर्म के पूरा होने में संदेह बना रहता हैं. छल प्रपंच की बात दूर दूर तक नहीं की जानी चाहिए. नीतियों में सेवा भाव का समावेश ही उसके सफल क्रियान्वयन की पहली सीढी होती है, और सेवा भाव को अपनाना तभी संभव हो सकता है जब हम स्वहित की मानसिकता से ऊपर उठ सकें और अपने आस-पड़ोस के वातावरण को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से स्वच्छ करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका के निर्बहन में स्वयं के योगदान को स्वीकार कर सकें. जब तक हमारा मन स्वस्थ नहीं होगा हम ऐसे ही दूसरों के मन के अस्वस्थ होने की दुहाई देते रह जायेंगे, और इसी विकृत मानसिकता से भरे समाज में स्वयं के स्वस्थ मानसिकता का होने का ढोंग करते रहेंगे.

 

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Niraj Pathak IT-Professional, Motivational Speaker, Writer, Ward-Councillor at Municipal Council of Phusro.
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