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धंधे मातरम

धंधे मातरम
25 Aug 2019 No Comments Poem Niraj Pathak

(कर्म ही पूजा है)

इसके-उसके काम करूं मैं,
चिंता नहीं आराम की।
वक्त की रेत मुट्ठी से फिसले,
तब याद आए भगवान की।।
धंधे मातरम धंधे मातरम….

सारी रात मैं जगता जाऊं,
सुबह उठूं फिर देर से।
जैसे तैसे ध्यान धरुं मैं,
बात करूं सिर्फ काम की।।
धंधे मातरम धंधे मातरम….

दुष्टों से मैं लड़ता जाऊं,
प्यार सभी से करता जाऊं।
सुनता मन की करता सबकी,
न बात करूं अभिमान की।।
धंधे मातरम धंधे मातरम….

भूले को मैं राह दिखाऊं,
बिसरों को मैं गले लगाऊं।
जिसके मन जो भाये कह ले,
चिंता नहीं अपमान की।।
धंधे मातरम धंधे मातरम….

रूठों को मैं सदा मनाऊं,
ध्यान रखूं मर्यादा का।
बन आए जब आन पे मेरी,
रक्षा करूं स्वाभिमान की।।
धंधे मातरम धंधे मातरम….

आंख मिलाकर बात करूं,
और चलूं मैं सीना तान के,
ऐसा करना फर्ज मैं समझूं,
जब बात आए सम्मान की।।
धंधे मातरम धंधे मातरम….

गांठ बांध लो इन बातों का,
और थोड़ा धरना ध्यान भी।
मैं अद्भुत हूं तू भी बन जा,
बात करूं मैं ज्ञान की।।
धंधे मातरम धंधे मातरम…

©® नीरज पाठक अद्भुत २००९

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About The Author
Niraj Pathak IT-Professional, Motivational Speaker, Writer, Ward-Councillor at Municipal Council of Phusro.
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